Friday, April 23, 2010

नफ़रत का ज़हर

आँखों में नफ़रत का ज़हर, होठों पे क्यों ये बात हो,
प्रहार करो गली-मुहल्ले से, अब ना कोई पाक हो,
जिस ओर से चली थी गोलिया, रातों के अंधेरे में,
अब लुपाचुपी खेल रहे है, कुछ बच्चे वहाँ सवेरे में,
तान में बँधूक उनपे कैसे कहु के तुम ही सपोले हो,
घर जलाती आग की लपटे हो तुम, तुम ही शोले हो,
ढूँढ नही पाए हम, जिसने ताज-कश्मीर जलाया था,
नादानो तुम्हे मार, कैसे में कहु के दुश्मन सॉफ हो,
जो आतंकी बरसात थे लाए, वो सरहद पार से आए थे,
तुम भी तो सरहद पार रहते हो, कैसे तुम बेगुनाह हो?
जो बहा मेरे देश के ताज पे, वो खून भी तो बेगुनाह था,
खून के बदले खून मिले, अब आँख के बदले आँख हो,
एक फ़र्क जो मुझमें-उसमे में था वो मिटा के क्यों कहु,
प्रतिशोध की ज्वाला में अब तू-दुश्मन जलके राख हो
तुम्हे ज़्यादा जाना तो नही पर बारूद ख़ाके जीते होगे,
नरसंहार की बातें कर तुम रोज़ हमको खाते पीते होगे
कैसे मानु बीमारी और भूख से वहाँ कोई मरता ना होगा,
कैसे बोलू सब एक से हो, चाहे दिखते तुम सौ-लाख हो,
तुम भी भोले नही हो, और में भी चुप नही सहने वाला,
एक दूसरे की मौत की बातें करते रहेंगे जब भी रात हो,
पर आज अगर तुम आए हो में क्यों सियासाती खेल रचु,
क्यों कहु सब मरते है मारे पर हम में ना कोई बात हो,
आओ बैठे सब पुराने घाव उधेड़े, आओ, बैठे बाते करले,
आओ यहाँ देखो तुम जो घाव तुम्हारे बच्चों ने छोड़े है,
आओ अब देखो की सारे सपने उन्होने जो अधूरे तोड़े है,
आओ अगर बात नही करेंगे तो कैसे ये समज पाओगे,
नही रोकोगे संतान जो अपनी, तुम भी यूँ मर जाओगे,
आओ बैठ के समजता हू, तुम देश नही सियासत हो,
तुम अमन के प्रेमी रहे नही, बेअकल एक रियासत हो,
तुम अपने लोगो को हर सियासत सा बेच के खाते हो,
जो मुर्दो पे वोट बनाए तुम ऐसी अनोखी एक जात हो,
हम बात करने को राज़ी है, हम लोगो से दिल जोड़ेंगे,
तुम लोगो को बहकना मत, नही ये सोच हम भी खो देंगे,
आँखों में नफ़रत का ज़हर, होठों पे क्यों ये बात हो,
प्रहार करो गली-मुहल्ले से, अब ना कोई पाक हो,

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