Thursday, October 2, 2014

Gazal

न किसी से कोई गिला रहा, न किसी के रास्ते चल सके,
ये अमावसों के चाँद है, न ये पल सके ना ही ढल सके

अबिलो-गुलाल उड़ा लिए, दिये सौ तरह के जला लिए,
कमज़ोर थे जो दुआओं में, मयखाने में, वो संभल सके,

बहती रही नदी प्यार की, पर जाने कैसी ये प्यास थी,
जो समन्दरों को मिले मगर, उसको न कोई निगल सके

उनको यकीन कि सही है वो, मुझे ऐतराज़ 'सही' है क्या?
मुझे तू बता एक चीज़ जो, बन तो गई ना बदल सके

बरसों जहन में छुपी रही, न कही गयी एक बात वो,
कहे लाख किस्से बहार के, पतझड़ को पर नहीं छल  सके 

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